Wednesday, December 30, 2009

आज हम पहाड़ लाँघेंगे

प्रकाश बादल मेरे ब्लॉग गुरु हैं. गत वर्ष उन्हों ने हिमाचल के तमाम कवियों को आभासी दुनिया में प्रस्तुत करने की योजना बनाई. मैंने खुशी खुशी अपनी समस्त टंकित कविताएं दे दी . लेकिन तीन कविताएं डाल कर चुप हो गए गुरु जी. न तो मुझे मॉडरेशन की कुंजी दें, न खुद ही नए पोस्ट लगाएं. मज़बूर होकर मुझे अपना एक ब्लॉग बनाना पड़ा. विजय गौड़, शिरीष, और खुद बादल ने इस काम में मेरी बड़ी मदद की. इन छह महीनों में मैंने पाया कि यह जगह तो मेरे मन की है. अभी सीख ही रहा हूँ, लेकिन यहाँ मुझे कविता के कुछ इतने गंभीर लोग मिले हैं कि प्रिंट मीडिया में शायद उन्हें मिस कर जाता.
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो बताए....
एस आर हरनोट् जैसे मित्रों का आग्रह था कि नए साल की पहली कविता आलोचना या तद्भव को भेजूँ। लेकिन गुरु जी की फरमाईश पर इस वर्ष की पहली कविता ब्लॉग पर. गुरु दक्षिणा समझें. एकलव्य ने अंगूठा दे दिया था. मैं अपने दो शुभचिंतक मित्रों के साथ साथ कुछ नामवर लोगों को भी नाराज़ कर रहा हूँ, इस उमीद के साथ कि भविष्य के द्रोणाचार्य प्रकाश बादल से कुछ सीखॆंगे.

खैर, कविता का संदर्भ नव वर्ष का है, पहाड़ के खानाबदोश जीवन का है. इसे ऊपर की टिप्पणी से अलगा कर पढ़ें.
आप सब को नव वर्ष की शुभ कामनाएं.


पहाड़ी खानाबदोशों का गीत

अलविदा ओ पतझड़ !
बाँध लिया है अपना डेरा-डफेरा ,हाँक दिया है अपना रेवड़
हमने पथरीली फाटों पर
यह तुम्हारी आखिरी ठण्डी रात है
इसे जल्दी से बीत जाने दे
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की दुनिया देखेंगे !

विदा, ओ खामोश बूढ़े सराय !
तेरी केतलियाँ भरी हुई हैं लबालब हमारे गीतों से.
हमारी जेबों में भरी हुई है ठसाठस तेरी कविताएं
मिलकर समेट लें भोर होने से पहले
अँधेरी रातों की तमाम यादें
आज हम पहाड़ लाँघॆंगे
उस पार की हलचल सुनेंगे !

विदा , ओ गबरू जवान कारिन्दो !
हमारी पिट्ठुओं में ठूँस दिए हैं तुमने
अपनी संवेदनाओं के गीले रूमाल
सुलगा दिया है तुमने हमारी छातियों में
अपनी अँगीठियों का दहकता जुनून
उमड़ने लगा है एक लाल बादल आकाश के उस कोने में
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की हवाएं सूँघेंगे !

सोई रहो बरफ में
ओ, कमज़ोर नदियो
बीते मौसम तुम्हें घूँट घूँट पिया है
बदले में कुछ भी नहीं दिया है
तैरती है हमारी देहों में तुम्हारी ही नमी
तुम्हारी ही लहरें मचलती हैं हमारे पाँवों में
सूरज उतर आया है आधी ढलान तक
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की धूप तापेंगे !

विदा, ओ अच्छी ब्यूँस की टहनियों !
लहलहाते स्वप्न हैं हमारी आँखों में
तुम्हारी हरियाली के
मज़बूत लाठियाँ हैं हमारे हाथों में
तुम्हारे भरोसे की
तुम अपनी झरती पत्तियों के आँचल में
सहेज लेना चुपके से
थोड़ी सी मिट्टी और कुछ नायाब बीज
अगले बसंत में हम फिर लौटेंगे !
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की धूप तापेंगे !
कारगा, दिसम्बर .2009

Wednesday, December 9, 2009

इस बार कुछ फोटो

  • केलंग में पानी का यह रूप आप द्रष्टाओं को रोमांचक लग सकता है. लेकिन भोक्ताओं के लिए यह भयावह है ! यह नज़ारा अभी हाल ही के हिमपात के दिनों का है।जब पारा माईनस 7*c पर पहुँचा था . सोचिए, आने वाले कुछ दिनों में इसे माईनस 25* c तक उतर जाना है......

    मेरी खिड्की से ( जून 2009)







  • मेरी खिड़्की से (अक्तूबर 2009)




रोह्तांग जोत, (सितम्बर 2009.) निःसर्ग की इस छटा का आनंद लेने देश के मैदानी इलाक़ों से प्रति वर्ष लाखों सैलानी यहाँ आते हैं. और इस स्वप्न लोक की अनूठी स्मृतियाँ लिए लौट जाते हैं. कौन सोच सकता है कि सर्दियों में पीर पंजाल शृंखला पर स्थित यह मनोरम दर्रा साक्षात मौत का रूप धारण कर लेता है.




बस हल्का सा हिम पात और रोह्तांग के दोनों ओर वाहनों की ऐसी लम्बी कतारें लग जाती हैं. अच्छी धूप लगी हो तो इस से रोमांटिक कोई जगह नही रोह्तांग पर; लेकिन तूफान चल पड़े, तो ईश्वर ही मालिक है इन वाहनों और इन मे बैठी सवारी का।यह खूनी राहनी नाला का क्षेत्र है जो हर साल मानव बलि ले लेता है. कुछ दिन पहले ठीक इसी स्थान पर मौत ने अपना ताण्डव खेला था . सीज़न खत्म कर अपने देस लौटते झारखण्ड के मज़दूरों का पूरा समूह यहाँ तूफान मे फँस गया था. 60 लोगों की जान पुलिस रेस्क्यू टीम ने बचा ली. 9 लाशें मिलीं , बाक़ी सब लापता. मई जून मे बर्फ पिघलने पर ही पता लग सकेगा कि मृतकों की उनकी सही सही संख्या क्या थी।

बीसवीं सदी के आरम्भ मे इसी जगह तक़रीबन डेढ़् सौ सिराजी (कुल्लू की बंजार घाटी के निवासी) मज़दूर बर्फीली तूफान का ग्रास बन गए थे. ये लोग चन्द्र भागा संगम पर ऐतिहासिक तान्दी पुल बना कर लौट रहे थे. प्रत्यक्ष दर्शियों के हवाले से मेरे गाँव के बुज़ुर्ग बताते हैं कि इसी स्थान पर ये लोग अपनी औरतों, बच्चों, और खच्चरों के साथ भीषण शीत के चलते खड़े खडॆ ही जम गए थे. मेरे पास फोटो नहीं है, लेकिन मैं उस भयानक दृश्य की कल्पना कर सकता हूँ....

  • भी इस वक़्त जब मैं यह पोस्ट डाल रहा हूँ, रोह्तांग पर भारी बरफबारी हो रही है. अभी अभी मेरी बात गाँव के एक टैक्सी चालक प्रदीप से हुई थी. वह दोपहर अढ़ाई बजे रोह्तांग टॉप से वापस लौट आया। उस वक़्त तक वहाँ सड़क पर चार इंच बरफ जम चुकी थी . कोहरा घना था. उसे आगे जाने की हिम्मत नही हुई. उस पार पहुँच जाता तो सर्दियाँ मनाली में लगाता, कुछ धन जोड़ पाता खुद की गाड़ी खरीदने के लिए...लेकिन उस ने सोचा , जान है तो जहान है. पैसा फिर बन जाएगा. कई टेक्सियाँ खतरा उठा कर उस पार निकल गई हैं..... पता नहीकिस हाल में हैं क्रॉस हो गए, या फँसे हैं. एक टाटा सुमो राक्षसी ढाँक पर रुका था । एक्सेल टूट गया था. अन्दर कुछ मरीज़ और बुज़ुर्ग जन थे. गाड़ी 4बाई 4 थी, तो प्रदीप ने सोचा कि यह किसी न किसी तरह निकल ही जाएगी. पहले खुद को सेफ जगह पहुँचा दूँ। उस जगह मोबाएल पर सिग्नल भी नहीं था । रोह तांग पर अपनी जान सब से प्यारी होती है. जो खुद को न बचा सका, मर जाता है. पता नहीं उन्हें कुछ मदद मिली कि नहीं. लेकिन प्रदीप केलंग मे अपने मामा के क्वार्टर मे तंदूर सेक रहा है........ ज़िन्दा !