Wednesday, December 30, 2009

आज हम पहाड़ लाँघेंगे

प्रकाश बादल मेरे ब्लॉग गुरु हैं. गत वर्ष उन्हों ने हिमाचल के तमाम कवियों को आभासी दुनिया में प्रस्तुत करने की योजना बनाई. मैंने खुशी खुशी अपनी समस्त टंकित कविताएं दे दी . लेकिन तीन कविताएं डाल कर चुप हो गए गुरु जी. न तो मुझे मॉडरेशन की कुंजी दें, न खुद ही नए पोस्ट लगाएं. मज़बूर होकर मुझे अपना एक ब्लॉग बनाना पड़ा. विजय गौड़, शिरीष, और खुद बादल ने इस काम में मेरी बड़ी मदद की. इन छह महीनों में मैंने पाया कि यह जगह तो मेरे मन की है. अभी सीख ही रहा हूँ, लेकिन यहाँ मुझे कविता के कुछ इतने गंभीर लोग मिले हैं कि प्रिंट मीडिया में शायद उन्हें मिस कर जाता.
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो बताए....
एस आर हरनोट् जैसे मित्रों का आग्रह था कि नए साल की पहली कविता आलोचना या तद्भव को भेजूँ। लेकिन गुरु जी की फरमाईश पर इस वर्ष की पहली कविता ब्लॉग पर. गुरु दक्षिणा समझें. एकलव्य ने अंगूठा दे दिया था. मैं अपने दो शुभचिंतक मित्रों के साथ साथ कुछ नामवर लोगों को भी नाराज़ कर रहा हूँ, इस उमीद के साथ कि भविष्य के द्रोणाचार्य प्रकाश बादल से कुछ सीखॆंगे.

खैर, कविता का संदर्भ नव वर्ष का है, पहाड़ के खानाबदोश जीवन का है. इसे ऊपर की टिप्पणी से अलगा कर पढ़ें.
आप सब को नव वर्ष की शुभ कामनाएं.


पहाड़ी खानाबदोशों का गीत

अलविदा ओ पतझड़ !
बाँध लिया है अपना डेरा-डफेरा ,हाँक दिया है अपना रेवड़
हमने पथरीली फाटों पर
यह तुम्हारी आखिरी ठण्डी रात है
इसे जल्दी से बीत जाने दे
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की दुनिया देखेंगे !

विदा, ओ खामोश बूढ़े सराय !
तेरी केतलियाँ भरी हुई हैं लबालब हमारे गीतों से.
हमारी जेबों में भरी हुई है ठसाठस तेरी कविताएं
मिलकर समेट लें भोर होने से पहले
अँधेरी रातों की तमाम यादें
आज हम पहाड़ लाँघॆंगे
उस पार की हलचल सुनेंगे !

विदा , ओ गबरू जवान कारिन्दो !
हमारी पिट्ठुओं में ठूँस दिए हैं तुमने
अपनी संवेदनाओं के गीले रूमाल
सुलगा दिया है तुमने हमारी छातियों में
अपनी अँगीठियों का दहकता जुनून
उमड़ने लगा है एक लाल बादल आकाश के उस कोने में
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की हवाएं सूँघेंगे !

सोई रहो बरफ में
ओ, कमज़ोर नदियो
बीते मौसम तुम्हें घूँट घूँट पिया है
बदले में कुछ भी नहीं दिया है
तैरती है हमारी देहों में तुम्हारी ही नमी
तुम्हारी ही लहरें मचलती हैं हमारे पाँवों में
सूरज उतर आया है आधी ढलान तक
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की धूप तापेंगे !

विदा, ओ अच्छी ब्यूँस की टहनियों !
लहलहाते स्वप्न हैं हमारी आँखों में
तुम्हारी हरियाली के
मज़बूत लाठियाँ हैं हमारे हाथों में
तुम्हारे भरोसे की
तुम अपनी झरती पत्तियों के आँचल में
सहेज लेना चुपके से
थोड़ी सी मिट्टी और कुछ नायाब बीज
अगले बसंत में हम फिर लौटेंगे !
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की धूप तापेंगे !
कारगा, दिसम्बर .2009

Wednesday, December 9, 2009

इस बार कुछ फोटो

  • केलंग में पानी का यह रूप आप द्रष्टाओं को रोमांचक लग सकता है. लेकिन भोक्ताओं के लिए यह भयावह है ! यह नज़ारा अभी हाल ही के हिमपात के दिनों का है।जब पारा माईनस 7*c पर पहुँचा था . सोचिए, आने वाले कुछ दिनों में इसे माईनस 25* c तक उतर जाना है......

    मेरी खिड्की से ( जून 2009)







  • मेरी खिड़्की से (अक्तूबर 2009)




रोह्तांग जोत, (सितम्बर 2009.) निःसर्ग की इस छटा का आनंद लेने देश के मैदानी इलाक़ों से प्रति वर्ष लाखों सैलानी यहाँ आते हैं. और इस स्वप्न लोक की अनूठी स्मृतियाँ लिए लौट जाते हैं. कौन सोच सकता है कि सर्दियों में पीर पंजाल शृंखला पर स्थित यह मनोरम दर्रा साक्षात मौत का रूप धारण कर लेता है.




बस हल्का सा हिम पात और रोह्तांग के दोनों ओर वाहनों की ऐसी लम्बी कतारें लग जाती हैं. अच्छी धूप लगी हो तो इस से रोमांटिक कोई जगह नही रोह्तांग पर; लेकिन तूफान चल पड़े, तो ईश्वर ही मालिक है इन वाहनों और इन मे बैठी सवारी का।यह खूनी राहनी नाला का क्षेत्र है जो हर साल मानव बलि ले लेता है. कुछ दिन पहले ठीक इसी स्थान पर मौत ने अपना ताण्डव खेला था . सीज़न खत्म कर अपने देस लौटते झारखण्ड के मज़दूरों का पूरा समूह यहाँ तूफान मे फँस गया था. 60 लोगों की जान पुलिस रेस्क्यू टीम ने बचा ली. 9 लाशें मिलीं , बाक़ी सब लापता. मई जून मे बर्फ पिघलने पर ही पता लग सकेगा कि मृतकों की उनकी सही सही संख्या क्या थी।

बीसवीं सदी के आरम्भ मे इसी जगह तक़रीबन डेढ़् सौ सिराजी (कुल्लू की बंजार घाटी के निवासी) मज़दूर बर्फीली तूफान का ग्रास बन गए थे. ये लोग चन्द्र भागा संगम पर ऐतिहासिक तान्दी पुल बना कर लौट रहे थे. प्रत्यक्ष दर्शियों के हवाले से मेरे गाँव के बुज़ुर्ग बताते हैं कि इसी स्थान पर ये लोग अपनी औरतों, बच्चों, और खच्चरों के साथ भीषण शीत के चलते खड़े खडॆ ही जम गए थे. मेरे पास फोटो नहीं है, लेकिन मैं उस भयानक दृश्य की कल्पना कर सकता हूँ....

  • भी इस वक़्त जब मैं यह पोस्ट डाल रहा हूँ, रोह्तांग पर भारी बरफबारी हो रही है. अभी अभी मेरी बात गाँव के एक टैक्सी चालक प्रदीप से हुई थी. वह दोपहर अढ़ाई बजे रोह्तांग टॉप से वापस लौट आया। उस वक़्त तक वहाँ सड़क पर चार इंच बरफ जम चुकी थी . कोहरा घना था. उसे आगे जाने की हिम्मत नही हुई. उस पार पहुँच जाता तो सर्दियाँ मनाली में लगाता, कुछ धन जोड़ पाता खुद की गाड़ी खरीदने के लिए...लेकिन उस ने सोचा , जान है तो जहान है. पैसा फिर बन जाएगा. कई टेक्सियाँ खतरा उठा कर उस पार निकल गई हैं..... पता नहीकिस हाल में हैं क्रॉस हो गए, या फँसे हैं. एक टाटा सुमो राक्षसी ढाँक पर रुका था । एक्सेल टूट गया था. अन्दर कुछ मरीज़ और बुज़ुर्ग जन थे. गाड़ी 4बाई 4 थी, तो प्रदीप ने सोचा कि यह किसी न किसी तरह निकल ही जाएगी. पहले खुद को सेफ जगह पहुँचा दूँ। उस जगह मोबाएल पर सिग्नल भी नहीं था । रोह तांग पर अपनी जान सब से प्यारी होती है. जो खुद को न बचा सका, मर जाता है. पता नहीं उन्हें कुछ मदद मिली कि नहीं. लेकिन प्रदीप केलंग मे अपने मामा के क्वार्टर मे तंदूर सेक रहा है........ ज़िन्दा !

Saturday, November 28, 2009

चिट्ठी आई है.......

इस बार रोह्ताँग दर्रा नवम्बर के आरम्भ में ही बन्द हो गया । पुराने दिनो की तरह सर्दियाँ बड़ी लम्बी हो गईं . उन दिनों न मोबाईल थे, न टी वी, न ही इंटरनेट. बस चिट्ठियों का ही सहारा होता था .वो भी महीनों बाद पहुँचतीं. पर तब उन की बड़ी क़दर थी . छतों पर नमकीन चाय की चुस्कियों के साथ पूरे पड़ोस में चिट्ठी पढ़ी सुनी जाती, बड़े ही चाव के साथ. आठ से पन्द्र्ह नवम्बर तक इस बर्ष भी क़रीब क़रीब वैसी ही स्थितियाँ बन रही थीं. बिजली बन्द , तो सब कुछ बन्द।
मैं एक आत्मीय सी चिट्ठी के लिए तड़्प उठा था।
कवि अनूप सेठी ने अपनी कविताओं पर विभिन्न लोगों की टिप्पणियां मुझे पढ़ने के लिए भेजी थीं। एक छोटे से फॉरवार्डिंग नोट के साथ. जवाब में उन को एक लम्बा पत्र लिखा.
जैसे ही बिजली आई, भाई सुरेश सेन निशांत का फोन आया। रोह्ताँग पर आठ मज़दूरों की मृत्यु की खबर उन तक पहुँच चुकी थी. वे विचलित थे. वे लाहुल कभी नही आए. फोन पर हमारी बातचीत के आधार पर ही इस क्षेत्र को थोड़ा पूरा जानते हैं. हिमपात के इन दिनो मे वे मेरे बारे सोचते रहे थे. फोन बन्द थे , अतः अपनी कविताओं में मुझे खत लिखते रहे . उन्हो ने अनेक पत्र मुझे फोन पर सुनाए.
ऐसे आत्मीय पत्र मुझे बहुत कम मिले हैं। यों भाई निशांत पत्र कम शम ही लिखते हैं, ई- मेल तो हर्गिज़ नहीं. फोन पर ही अपनी भड़ास निकाल लेने में विश्वास रखते हैं. लेकिन मेरे आग्रह पर ये तमाम पत्र मुझे ई- मेल करने को राज़ी हो गए. फोंट की समस्या के चलते नौ दिन पहले प्राप्त इस ई- मेल को आज ही युनिकोड मे बदल सका।
सोचा कि इस बार आप सब के साथ उन में से कुछ टुकड़े शेयर करूँ। कि मेरे देश को आप ऐसे कवि की आँखों से देखें,, जिस ने स्वयं इस देश को कभी नही देखा. फोटो कुछ दिन बाद पोस्ट करूँगा.
विजय गौड़ का शुक्रिया कि उन्हो ने अपने मेल द्वारा मुझे हरकत मे लाया.



कवि अजेय को एक पत्र


कहो, कैसी है
वहां धूप
खूब चिढ़ाती होगी
वह तो आजकल।

अँधेरी रात
में याद आती होगी
कोई कविता

उसे पढ़ने की इच्छा
देर तक ढूंढती रहती होगी
उस दीये की लौ
तीन दिन पहले ही
जलकर हो चुका है खत्म
जिसका तेल।
***********
अँधेरा
कांटे सा चुभता है
हवा
शीत की तलवार लेकर
घूमती है बेखौफ

पिछली गर्मियों में
`शुर´ का वह अकेला पेड़ भी
जलकर
हो गया है खाक
जिसके हरेपन ने
न जाने कितनी बार बचाया
उदासियों में डूबने से
तुम्हें
हिमपात के इन
कठिन दिनों में।
**************
काश! अँधेरे को
गीतों सा गुनगुनाया जा सकता
उदासियों को जलाकर
मिटाई जा सकती ठंड
पिघलाई जा सकती मुसीबतें
बर्फ नहीं ......
******************
नंगे हो गए हैं पहाड़
पता नहीं कौन चुरा ले गया
इनके वस्त्र।

दर्द पहाड़ों का
और हमारा
ढेर सारा।

कितने कागजों पर
लिखूं बार-बार इस
छोटी सी कथा को।

****************
जब हम नहीं रहेंगे
तुम बपर्फ बनकर
ढकना इन पहाड़ों को।

मैं बीज बनकर
उगूंगा इन तलहटि्टयों में।

इस तरह बचे रहेंगे
धरती के हृदय में
हरापन, बर्फ और हम दोनों।
******************
तुम्हारी झील के
परिंदे तो आ गए हैं यहां
तुम रह गए वहीं
बर्फ की पहरेदारी में।

मैं अपने हाथों से
हौले से हिलाता हूं यहां
अपनी झील के इस जल को
तुम तक पहुंचता होगा जरूर
लहरों का यह कम्पन
हथेलियों की
छुअन लेकर।

तुम इस उष्मा से
तपाना अपने ठिठुरते हाथ
और लिखना अपनी व्यूंस की टहनियों पर
फिर से एक और कविता।
********************
कल जब तुम मिले बर्फ पर
क्यों चल रहे थे नंगे पांव।

कहां खो गए थे
तुम्हारे जूते?

गहरी नींद में देखा गया
स्वप्न तो नहीं था वो कहीं?

कल जब तुम मिले।
*****************
मैं आंखें बन्द
करूं और तुम तक पहुंच जाऊं

तुम बन्द कर आंखें
यहां तक उड़े आओ

इसके सिवा
उड़ने के भी बन्द हैं
सभी रास्ते
इस बर्फबारी में तो।
**************

Thursday, October 22, 2009

स्पिति- में चार दिन

अक्तूबर् 8, 2009 को मैं स्पिति में था. चार दिन वहीं घूमता रहा. काम सरकारी था, फिर भी मज़ा आया








स्पिति तिब्बत की सीमा से सटा हुआ हिमालय के उस पार भारत का एक अद्भुत भूखण्ड है. प्रथम दृष्टया यह किसी भी एंगल से भारत का हिस्सा नहीं लगता. लेकिन कुछ दिन यहां रह कर देखें, इसे जानने की कोशिश करें..........




हिमालय की प्राचीन भाषा जङ्जुङ का शब्द है स्पिति . जिस का अर्थ है चार नदियां। इस रेतीले पठार पर चार नहीं , अनेक नदियां बहतीं हैं। जो यहां बेहद खूबसूरत घाटियों का निर्माण करती हुई अंततः सतलुज में जा मिलतीं हैं.






स्पिति में याक अब बहुत कम रह गए है. ज़्यादातर ‘ज़ो’ से ही हल जोता जाता है। 'ज़ो ' याक और गाय की संकर संतति है. मुझे अपने गांव का याक याद आता है. उसे हम संतति के लिए पालते हैं . वह खेतों में खुला चरता है. भीमकाय व डरावना. लेकिन क्याटो गांव का यह हलधर जोड़ा कितना निरीह है! इन्हें मैं छू सकता हूं।




यह काज़ा गांव का बौद्ध मठ है, जो तंज्ञुत नाम से प्रख्यात है. यह एशिया के सब से ऊंचे गांव कोमिक के ऊपर एक टीले पर स्थित है. अर्थात हिमालय पर सब से ऊंची बस्ती। अविश्वसनीय , लेकिन इस सरकारी साईन बोर्ड को आप झुठला नहीं सकते.


काज़ा के पीछे इस दुर्गम पठार पर समुद्र तल से चार से साढ़े चार हज़ार मीटर की ऊंचाई वाली ऐसी सात आठ बस्तियां हैं. सभी सड़क से जुड़ चुकीं हैं. हर बस्ती में एक बौद्ध मठ है, जिस में बच्चे पारम्परिक धर्म के साथ साथ आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. कुछ मठों में तो हिमाचल सरकार के मिडल स्कूल भी चल रहे हैं, जहां सी.बी.एस.ई. का पाठ्य क्रम पढ़ाया जा रहा है. ऐसे ही एक स्कूल का अध्यापक छिमेद दोर्जे हिन्दी में सुन्दर कविताएं लिखता है. उन का साहित्यिक नाम मोहन सिंह है. आगामी किसी पोस्ट मे उस की कविता डालूंगा.
छल - कबड्डी ताल- ताल , मेरी मूँछें लाल-लाल..... यह मठ का प्रांगण है.4587 मीटर की ऊंचाई पर नन्हे बटुक कबड्डी खेल रहे हैं. आओ हम भी ट्राई मारें..... मैं नहीं खेल सकता. दम घुटने लगता है. यहां कल्ज़ङ दोर्जे तथा देकिद ड्रोल्मा जैसे विश्व्स्तरीय खिलाड़ी पैदा हुए.यहां के बच्चों ने हमें पंजाबी ट्प्पे सुनाए:
कोठे ते आया करो, जदों असी सो जाएं, तुसी मखीयां उड़ाया करो....






यह लङ्ज़ा गाँव है. (4200मीटर)



सामने पौन किलोमीटर गहरी खाई (cliff) और पीछे अनंत पठारीय चरागाह है। मवेशियों और चरवाहों का स्वर्ग. दूर क्षितिज में 'शि-ला' पर्वत है. इस के पीछे तिब्बत की कुख्यात पार्छू घाटी है, जिस ने कुछ साल पहले सतलुज घाटी पर कहर बरपाया था. इसी इलाक़े मे गत दिनों चीन की गतिविधियों की खबरें थीं. शायद ये खबरें मीडिया और सत्ता के गलियारों तक ही सीमित थीं. बस्तियों में लोग निश्चिंत हैं. हमेशा की तरह जौ उगाते, मवेशी हाँकते, मस्त !






ताबो 996 ईस्वी मे बना साधना केन्द्र है. सम्भवतः पश्चिमी हिमालय का सब से प्राचीन अध्ययन संस्थान भी। महानुवादक रिंचेन ज़ङ्पो ने पूरे पश्चिमी हिमालय में धर्म और शिक्षा के प्रसार के लिए ऐसे 108 केन्द्र स्थापित किए थे. यहां का अद्भुत मिट्टी का स्थापत्य और उस के भीतर नायाब भित्ति चित्र देश विदेश से इतिहास विदों और कला मर्मज्ञों को आकर्षित करते हैं।


इधर कुछ वर्षों से इस धरोहर को कंक्रीट के जंगल ने घेर सा लिया है।


मैत्रेय, तुम न ही आओ तो अच्छा है......!

चार दिन इस दूसरी दुनिया में बिता कर लौटना , ज़ाहिर है, बहुत सुखद नही था। फिर भी 11 अक्तूबर् 2009 की सुबह घर लौटते हुए मेरी झोली इस दुनिया की नियामतों से ठसाठस भरी हुई थी:



ताज़ा जौ, 15/- प्रति किलो
रतन जोत,100/- प्रति 100ग्राम्
काले मटर,30/- प्रति किलो
फर्न,100/- प्रति250 ग्राम
छर्मा (सीबक थॉर्न) का जैम, 400/- प्रति किलो
स्पिति का सेब, 1200/- प्रति 20किलो.
तस्वीरें- एक जी बी। मुफ्त.
यादें- अनगिनत, मुफ्त।
अधूरी हसरतें-
# स्पिति के पहले हिन्दि कवि छिमेद दोर्जे उर्फ मोहन सिंह से एक मुलाक़ात्
# 'बुछेन ' लोक नाट्य कलाकारों से चर्चा
# वज्रयानी संत कवि मिला रेपा की एक दुर्लभ तस्वीर।
चीनियों द्वारा कथित रूप से पैंट की गई चट्टानें। (foto अपलोड नहीं हो सका. )
. हमारी मारुति जिप्सी धूल उड़ाती 187 किलोमीटर क़ाज़ा - केलंग हाईवे पर ये सारा सामान लादे चल पड़ी है. ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर हमारे जिस्म की एक एक हड्डी बज रही है. फिर भी मन तो मालामाल है !




































Monday, October 12, 2009

कुछ कहना चाह्ता हुआ पहाड़

अनूप सेठी हिमाचल के अग्रणी आधुनिक हिन्दी कवि हैं. वे पहाड़ में पैदा हुए, पले- बढ़े, और तमाम पहाड़ी बुद्धिजीवियों की तरह महानगर में बस गए-------- मन में पहाड़ के प्रति अथाह प्रेम व लगाव संजोए हुए, वे सतत सृजनशील हैं. हिमाचल मित्र नामक हिन्दी त्रैमासिक के माध्यम से वे पहाड़ की तमाम गतिविधियों पर नज़र रखे रहते हैं. पहाड़ के लिए उन का यह ‘कंसर्न’ मुझे प्रेरणा देता है.
उन का कविता संग्रह ‘जगत में मेला’ काफी चर्चित रहा . लेकिन जिन एकाध रचनाओं के कारण मैं उन्हे एक बडा कवि मानता हूं, उन में से एक है – ठियोग पर लिखी गई ये खूबसूरत कविता. ठियोग हिमाचल की राजधानी शिमला के निकट तेज़ी से उगता हुआ एक कस्बा है, जो कि यहां अपनी पहचान दर्ज करने लिए छटपटाते संघर्षरत पहाड़ का सुन्दर और स्वाभाविक प्रतीक बन कर उभर रहा है. मन तो था कि अनूप जी की कविताओं पर कुछ लिखूं. पर जब लिखने बैठा तो लगा कि यह कविता उनकी काव्य दृष्टि और रचनाधर्मिता का परिचय अपने आप दे रही है :

ठियोग

भेखल्टी में धूप सब से पहले आएगी
ठियोग के शालीबाज़ार के पीछे जब पहुंचेगी
बहुत से लोग तब तक शिमला पहुंच चुके होंगे

राजू ने छोले उबाल लिए होंगे
समोसे तले जा रहे होंगे
बस अड्डे पर घिसे हुए कैसेट बजने लगेंगे

धीरे धीरे धूप नीचे घाटियों तक उतरेगी
लोग ऊपर चढ़ेंगे बूढ़ों की तरह
निर्विकार खच्चरें मटरों की बोरियां लाद लाएंगी

खचाखच भरी पहाड़ी सैरगाह के पिछवाड़े बसा यह कस्बा
ट्रकों बसों की आवाजाही से थका
तहसील के दफ्तरों को लादे खड़ा
सेबों की साज सम्भाल मे मांदा हुआ जाता
सोडियम पके आमों को निहारता
कुछ बोलना चाहता है बोल नहीं पाता

बसें बहुत आतीं हैं आगे चली जातीं हैं
कोई नहीं ऐसी बस खत्म हो जाए यहां आकर
बने फिर यहां से जाने के लिए.

Monday, September 28, 2009

कुल्लू का दशहरा

नवरात्र खत्म, आज विजय दशमी है. यानि कि रावण का पुतला जलाने का दिन. हिन्दुस्तानियों का खुश होने का तरीक़ा . दुनिया भर की तमाम कौमें खुश होने के ऐसे ही तरीक़े ईजाद करतीं रहती हैं।



मैं कुल्लू मे हूं . पिता के पास. यहां का दशहरा कुछ अलग ही है. चूंकि लाहुल के किसान आलू और मटर बेच चुके हैं. कुल्लू का सेब बिक चुका है, ज़ाहिर है यहां भारी मेला लगने वाला है. हिमाचल् टूरिज़म ने इस मेले को हमेशा के लिए अंतर्राष्ट्रीय लोक नृत्य उत्सव घोषित कर रखा है।



ऐसे सैंकड़ों देवता दूर दूर से यहां आते हैं, रघुनाथ जी को सलाम ठोक कर चले जाते हैं.





उनके साथ अनेक बजंत्री चलते हैं - ढोल नगाड़े, , करनाले, रणसिंगे और शहनाई बजाते हुए . इन देवताओ को प्रशासन बतौर नज़राना कुछ धन देती है.

रघुनाथ यहां के सामंत महेश्वर जी के कुल देवता हैं. आज रघुनाथ जी का रथ खींचा जा रहा है।





महेश्वर जी की जलेब देखने के लिए ढालपुर मैदान में बड़ी भीड़ उमड़्ती है. वे बी जे पी से चुनाब भी लड़ा करते हैं. रघुनाथ का रथ और राजा जी की पारम्परिक जलेब के इलावा पता नही कब से यहां आर एस एस का परेड शो भी होने लगा है।



हिमाचल की सांस्कृतिक राजधानी मंडी के एक क़ामरेड लवण ठाकुर को लोक तंत्र के इस युग मे इन सामंती चोंचलों से खासी नफरत है. बजंत्रियो और अन्य देव कारकूनों के पक्ष वे अपनी गिरफ्तारी भी दे चुके है. उन की मांग है कि
या तो नज़राने मे दलित कारिन्दों का हिस्सा बढ़ाया जाए. या जलेब की परम्परा खत्म हो. (या फिर पालकी में डी सी साब बैठें. ) 'सूचना का अधिकार अधिनियम ' के तहत लवण ठाकुर ने इस महामेले की आय व्यय का हिसाब भी मांग रखा है.

जनता मस्त है. आखिर महनत कश साल मे एकाध बार मस्त होना भी तो चाहता है.

Sunday, September 13, 2009

पहाड़ भी देखता है मैदान को

मैदान के कवि ने पहाड़ को हमेशा एक अजूबे की तरह देखा है. पहाड़ और पहाड़ की तमाम चीज़ों को. लेकिन एक पहाड़ी कवि का मैदान और मैदान की चीज़ों के प्रति क्या नज़रिया है, कभी किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की . हाल ही में सूत्र सम्मान से पुरस्कृत मेरे मित्र कवि सुरेश सेन 'निशांत' ने एक मैदानी कवि से मिलने के बाद लिखी गई अपनी एक ताज़ी कविता मुझे फोन पे सुनायी. निश्च्य ही दिल्ली का वह कवि उस के लिये किसी अजूबे से कम नहीं है; लेकिन कहन की इस सादगी और भोले पन को तो देखें....


पहाड़ की बरसात में दिल्ली का कवि

मुझे दिल्ली का
एक बड़ा कवि शिमला में मिला
मैं अचरज और सहम से भरा भरा रहा
उस के इस हुनर पर कि
वह बारिश की इतनी फुहारों में
ज़रा भी नहीं भीगा था

मेरी बगल में बैठा रहा बड़ी देर
शुष्क थे उसके वस्त्र, तबीयत
चेहरा और बातें भी
अपने शिमला के कुछ कवि
हुए जा रहे थे फिदा
उसके इस हुनर पर

मैं सहम से भरा भरा
लौटा दूर अपने गांव
दिल्ली के कवि की
यह कौतुक भरी छवि लेकर
शायद पहला मौका था मेरा यह
दिल्ली के किसी कवि को
पहाड़ी बरसात में निहारने का.
- सुरेश सेन 'निशांत' 09.07.2009

Sunday, August 23, 2009

पन्द्रागस्त का जलसा



15 अगस्त को केलंग मे मेला लगता है. जनजातीय उत्सव. यह कोई स्थानीय पारम्परिक उत्सव नहीं , अपितु भारत की आज़ादी का जश्न है. 1947 मे पहली बार यह जलसा यहां से 10 किलोमीटर दूर कारगा में मनाया गया था . स्थानीय लोगों की भागीदारी और उत्सुकता को देखते हुए प्रशासकों ने सोचा कि क्यों न इस जश्न- ए -आज़ादी को सरकारी कार्यक्रम के साथ जोड़ कर इसे एक रेगुलर फीचर बना दिया जाए? यह सोच कारगर सिद्ध हुई, और न जाने कब इस जलसे को ज़िला हेडक्वार्टेर केलंग शिफ्ट कर दिया गया. हर वर्ष यह मेला ज़िला प्रशासन बड़े धूम धाम से मनाती है. स्थानीय ठेकेदारों, व्यपारियों, और बेचारे किसानों से भी इस आयोजन के लिए भारी चन्दा वसूला जाता है. बाहर से नाचने गाने वाले बुलाए जाते हैं. खूब धमाचौकड़ी मचती है. हम इसे बचपन से "पन्द्रागस्त का जलसा" नाम से मनाते हैं.


इस वर्ष बिहार - झारखण्ड और नेपाल के मज़दूर इस मेले में बहुतायत में दीखे . घाटी मे रोह्तांग टनल का काम शुरू होने वाला है, साथ मे कुछ जल-विद्युत परियोजनाएं भी सरगर्मियां दिखा रही हैं. राजनेता खुश हैं. बुद्धिजीवी खामोश.




2. इस माह मेरी मासी के बेटे रिंकू की शादी में खूब मज़ा आया. परम्परा पर बाहरी संस्कृति का गैर ज़रूरी असर देख कर क्षुब्ध भी हुआ.






3. मैंने इतिहासकार् तोबदन के साथ रंग्चा दर्रा होते हुए घण्टा पर्वत की परिक्रमा की. लाहुल के देवता इसी दर्रे से हो कर तिनन घाटी पहुंचे थे. अपने पुरखों के पद्चिन्हों पे चलते हुए मैं अजीब सा रोमांच महसूस कर रहा था.


इस बार इतना ही. अगली बार सुरेश सेन की कविता पोस्ट करूंगा, या फिर अनूप सेठी की कविताओं पर कुछ लिखूंगा. राजा गेपङ प्रसन्न रहें !

Thursday, July 23, 2009

विजय गौड़ के " रक्सेक् " से

विजय गौड़ हिमालय के आर- पार घूमते हैं, हिमालय को बड़ी शिद्दत से जानते हैं ....गत वर्ष यहाँ केलंग में इस यायावर कवि से मुलाक़ात हुई. मैं शर्मिंदा था कि यहां के दर्रों, पगडण्डियों, नदी -नालों, वनस्पतियों, जीव जंतुओं और लोगों के बारे मुझे ही जानकारियां दे रहे थे. इन विकट भूखण्डों को देख कर लिखने और जान कर लिखने में क्या फर्क़ है, इन की कविताएं पढ़ कर समझ पाया .



http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=अजेय



हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह से उन की एक कविता



भेड़ चरवाहे

एक
लकड़ी चीरान हो या भेड़ चुगान
कहीं भी जा सकता है
डोडा का अनवर
पेट की आग रोहणू के राजू को भी वैसे ही सताती है
जैसे बगौरी के थाल्ग्या दौरजे के
वे दरास में हों
रोहतांग के पार या,
जलंधरी गाड़ के साथ-साथ
बकरियों और भेड़ों के झुण्ड के बीच
उनके सिर एक से दिखायी देते हैं

विभिन्न अक्षांशों पर टिकी धरती
उनके चेहरे पर अपना भूगोल गढ़ दे
पर पुट्ठों पर के टल्ले तो एक ही बात कहेगें

दो
ऊँचे पहाड़ों पर देवता नहीं चरवाहे रहते हैं
भेडों में डूबी उनकी आत्मायें
खतरनाक ढलानों पर घास चुगती हैं

पिघलती चोटियों का रस
उनके भीतर रक्त बनकर दौड़ता है
उड्यारों में दुबकी काया
बर्फिली हवाओं के
धार-दार चाकू की धार को भी भोंथरा कर देती है
ढंगारों से गिरते पत्थर या, तेज़ उफनते दरिया भी
नहीं रोक सकते उन्हें आगे बढ़ने से
न ही उनकी भेड़ों को



ऊंचे- ऊंचे बुग्यालों की ओर


उठी रहती हैं उनकी निगाहें
वे चाहें तो किसी भी ऊंचाई तक ले जा सकते हैं भेड़ों को
पर सबसे वाजिब जगह बुग्याल ही हैं
ये भी जानते हैं



ऊँचाईयों का जुनून जब उनके सिर पर सवार हो तो भी


भेड़ों को बुग्याल में ही छोड़


निकलता है उनमें से कोई एक
बाकि के सभी बर्फ से जली चट्टानों की किसी खोह में
डेरा डाले रहते हैं
बर्फ के पड़ने से पहले तक




भेड़ों के बदन पर चिपकी हुई बर्फ को
ऊन में बदलने का खेल खेलते हुए भी रहते हैं बेखबर
कि उनके बनाये रास्ते पर कब्जा करती व्यवस्था जारी है,
ये जानते हुए भी कि रुतबेदार जगहों पर बैठे



रुतबेदार लोग
उन्हें वहां से बेदखल करने पर आमादा हैं,
वे नये से नये रास्ते बनाते चले जाते हैं
वहां तक



जहां, जिन्दगी की उम्मीद जगाती घास है
और है फूलों का जंगल




बदलते हुए समय में नक्शेबाज दुनिया ने
सिर्फ इतनी ही मदद की
कि खतरनाक ढाल के बाद
बुग्याल होने का भ्रम अब नहीं रहा
जबकि समय की नक्शेबाजी ने छीन लिया बहुत कुछ
जिस पर वे लिखने बैठें
तो भोज-पत्रों के बचे हुए जंगल भी कम पड़ जायेगें




भोज-पत्रों के नये वृक्ष रोपें जायें
पर्यावरणवादी सिर्फ यही कहेगें



उनके शरीर का बहता हुआ पसीना
जो तिब्बत के पठारों में
नमक की चट्टान बन चुका गवाह है
कि सूनी घाटियों को गुंजाते हुए भी
अनंत काल तक गाते रहेगें वे
दयारा बुग्याल हमारा है
नन्दा देवी के जंगल हमारे हैं
फूलों की घाटी में पौधों की निराई-गुड़ाई
हमारे जानवरों ने
अपने खुरों से की

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Thursday, July 16, 2009

तथागत ! तुम ने तो कहा था यह आखिरी जन्म है !







गत दिनों तिब्बती बौद्ध धर्म के अवतारी गुरु एवम् तिब्बत की निर्वासित सरकार के राजा महामहिम दलाई लामा जी श्री कालचक्रतंत्राभिषेक के सिलसिले मे काज़ा आए. काज़ा स्पिति उपमंडल का मुख्यालय है.पश्चिमी सैलानियों की भाषा में स्पिति और लद्दाख को "मिनि तिब्बत" कहा जाता है क्यों कि इन भारतीय हिमालयी पठारों और तिब्बत में गहरा भू-सांस्कृतिक साम्य है. महामहिम को जब भी अपने देश की याद आती है, इधर का रुख कर लेते हैं. यहां की भोली भाली जनजातियों को वे टूट कर प्यार करते हैं. मानो उन की अपनी ही प्रजा हो.




इस बार अपने प्रवचनों मे महामहिम ने बड़ी अच्छी बातें की......
मसलन ,

अगला दलाई लामा लोकतांत्रिक तरीक़े से 'भी' चुना जा सकता है.
वो एक स्त्री 'भी' हो सकती है.
इन आप्त - उदात्त वचनों को सुनने मेरे तमाम यार दोस्त वहां गये थे. मैं न जा सका. क्यों कि मुझे एक कविता मुझे याद आने लगी थी. सन 1994 मे जिस्पा (लाहुल) में हुए ऐसे ही आयोजन की तय्यारियों के दौरान लिखी गई ये कविता निकट भविष्य मे अवतार लेने वाले मैत्रेय बुद्ध को सम्बोधित थी.


मैत्रेय, क्या तुम राजा की तरह आओगे?
(दलाई लामा के जिस्पा आने पर)

मैंने भी सुना था मैत्रेय, तुम आने वाले हो
मैं भी आँखे बिछाए रहता था
आँगन में धूप तापता
फाट पे डंगर हांकता
खेत पे हल जोतता
लुगड़ी पीता, मेलों में ´ठुच्च` नाचता -
हर शाम
सोते बच्चे को तेरे आने की कहानियाँ सुनाता।

पर वह बच्चा आज क्या खबर लाया है
क्या तो राजसी इन्तज़ाम हो रहा है तुम्हारे लिए
पक्की चार दीवारियाँ
भारी भरकम दरवाज़े
बढ़िया लोहा
बढ़िया लकड़ी
बढ़िया सीमेंट !

खूब भव्य होना चाहिए सभागार
सोना , चांदी, मूंगा और फिरोज़ा!
महल जैसा-
क्या तुम्हें इन तैयारियों की खबर है मैत्रेय ?

और उस बच्चे को क्या जवाब दूँ
जो कहता है , बाबा
इस उजड्ड गाँव में क्यों आने लगा मैत्रेय ?
वह तो धूमता होगा जहाज़ों में
ताईवान , अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड
इतना बड़ा आदमी ........
हमें भी निकल लेना चाहिए बाबा, अपने मैत्रेय की खोज में सिंगापुर।

मैत्रेय, क्या तुम सचमुच आओगे?
अगर आओगे
तो क्या राजा की तरह
घोड़े पे सवार हो के लावलश्कर के साथ्
कि एक गरीब भिक्खु की तरह
गाँव की मेरी झोंपड़ी में?



रारिक, जुलाई 1993

Sunday, July 12, 2009

शुरू में एक प्रार्थना


प्रार्थना

ईश्वर
मेरे दोस्त,
मेरे पास आ!
यहाँ बैठ,
बीड़ी पिलाऊंगा
चाय पीते हैं।
बहुत दिनों बाद फ्री हूं
तुम्हारी गोद में सोऊंगा
तुम मुझे परियों की कहानी सुनाना
फिर न जाने कब फुरसत होगी?
अजेय - 1992