Tuesday, August 10, 2010

ये विभूति नरायण राय कौन हैं ?

मैं इस आदमी को नहीं जानता था.अब जानने लगा हूँ । क्यों कि इस आदमी ने एक सनसनी खेज़ टिप्पणी दे डाली है। जानना भी क्या, प्राय: हम किसी लेखक को उस के लिखे हुए से ही जानते हैं। लेकिन कुछ को हम इतर कारणों से भी जानते हैं.... मसलन.... बहुत से नाम याद आते हैं। खैर सब को क्यों लपेटना। एक किसी राम शरण जोशी को तब से जानता हूँ जब हंस में विश्वास घात सीरीज़ के अंतर्गत उस ने आदिवासी स्त्रियों की पूरी क़ौम को इसी तरह गरिआया था। बस इसी तरह से विभूति नारायण राय को भी जानने लगा हूँ जब नया ज्ञानोदय के में सुपर बेवफाई विषेशांक में उस ने लेखक स्त्रियों की पूरी क़ौम को गरिआया है। अब मैं किसी स्टॉल पर यह नाम देखूँगा तो ज़ाहिर है, अतिरिक्त उत्सुकता से वे क़िताबें खरीदूँगा.
यह अच्छी बात है कि मुझ जैसे युवा लेखकों के लिए ये महान विभूतियाँ बहुत अच्छे टिप्स दे जा रहीं हैं। हिन्दी में पहचान बनाने का य् ही तरीक़ा है...... शर्म की बात तो यह है कि इस गंगा मे हाथ धोने के लिए हम सब उतर पड़े. देखिए खुद मैं भी. बेह्तर होता इस प्रकरण को नज़र अन्दाज़् कर हम अपनी ऊर्जा रचनात्मक कामो मे लगाते.

10 comments:

  1. बदनाम भी जो हुए तो क्या नाम न होगा!!

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  2. वैसे कालिया ‘जी’ ने जो इंटरव्यू नया ज्ञानोदय में रचा है, वह तो अपनी पीठ थपथपाने के लिए ही रचा है। नया ज्ञानोदय की बढ़ती लोकप्रियता को उसका श्रेष्ठतर होना घोषित किया गया है। हम विभूति नारायण ‘जी’ को मानें न मानें, कालिया ‘जी’ ने तो उन्हें श्रेष्ठतम रचनाकार माना ही है। खैर, रूमाल से नाक ढाँपने का पक्षधर तो नहीं हुआ जा सकता था, सो लोग उनका परिचय पाकर चिल्ला रहे हैं। और रही बात रचनात्मकता की तो अजेय भाई, कभी-कभी संहार रचने के लिए जरूरी होता है। जगह को सजाने से पहले झाड़ू से बुहारना भी जरूरी है।

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  3. Kya Yah ek sanyog hai
    Ki apne blog me maine bhi Kah diya hai
    Ki hamaari duniya nahin hai ye

    Ek had tak hi tamaashe Achhe lagte hain shabdon ke
    Ek had tak hi
    kisi baahri mudde
    Aur murde ke sath chala ja sakta hai

    Sngthit nahin
    Samkaksh hokar hi ham kisi ke sath
    Kahin ja sakte hain

    Doosron ki banayi badhawaas duniya ko
    Sachhi duniya maan lena
    Aur usi me jeena-marna
    Palaayan hai
    Waastvik aur gahri duniya se

    Saahukaar aur sarkaar ke khoonte par koodne aur
    Aur us koodamkood men shaamil
    Paidaayashi murda Yuwaaon se door
    Ek duniya hai
    Jahaan jeewant jeewan palte hain

    Aaj maine likha hai :

    Chalo, ham kahin aur chalte hain

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  4. आपकी अंतिम पंक्ति में बहुत सार है.पर बात कभी कभी लेखकीय धर्म की भी हो जाती है.अब जब सभी ने इसे उठा ही लिया है तो इसे बड़े विमर्श में बदल ही लिया जाना चाहिए.एक वीकेंड गाल बजाऊ गोष्ठी की तरह कहीं ये सोमवार को समाप्त न हो जाय.

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  5. Rajendra Yadav khud likh chuke hain- hona sona ek sunada stree ke sath

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  6. वो पूछते हैं कि गालिब कौन है ,
    तुम्हीं बतलाओ कि हम बतलायें क्या !

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  7. Vibhuti Narain Rai sach kahne ki sajaa bhugat rahe hain.

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  8. आप सब सही कह रहे हैं. लेकिन # सिधेश्वर भाई, 'उर्दू' ग़ालिब को तो हिन्दी का बच्चा बच्चा जानता है लेकिन हिन्दी की इस विभूति को हिन्दी का यह बच्चा सच में नही जानता था. कोई शे'र इन का लिखा याद नहीं पड़्ता. # ओशिया , कहीं और क्यों जाएं ? यहीं रह कर सफाई करेंगे पर्मेन्द्र भाई के साथ. यहीं अपने लायक जगह बनाएंगे # रत्नेश भाई, सज़ा है या मज़ा यह तो भोक्ता ही बता पाएगा. लेकिन मुझे यह टिप्पणी 'आयोजित' लग रही है. कल ही अरुण देव ने इस मुद्दे फेस बुक पर विष्णु खरे का विस्तृत लेख लगाया है.खरे जी की भड़ास जो भी हो, लेख मे कुछ महत्वपूर्ण सूचनाए मिल्ती हैं जो हिन्दी के नाम पर मलाई खाने के इस परिदृष्य को और स्पष्ट करतीं हैं.

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  9. नज़रअंदाज करने लायक नहीं है...
    ...गंभीरता से ही इनका आसन डोलेगा!

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