Monday, March 21, 2011

मैं लौट कर आऊँगा --3

लोट गाँव में जहाँ एक दुकान हुआ करती थी वहाँ ढाबा खुल गया है. खाकी वर्दी पहने बच्चे स्कूल जा रहे हैं. ढाबे के बरामदे में लोग ठेठ पहाड़ी अन्दाज़ में चा सुड़कते हुए इंतज़ार कर रहे हैं . गुनगुनी धूप या बॉर्डर रोड्स का ट्रक ; जो भी पहले पहुँच जाय ! ढाबे का मालिक नया नया स्कूल से छूटा हुआ छोकरा प्रतीत होता है . उस में ढेर सारी ऊर्जा है.इस ठण्ड मे एक पतला हाईनेक पहने हुए है. उस के नीचे कबाड़ वाली डाँगरी और आर्मी के सफेद स्नो बूट .गरम पारका कोट उतार कर उस ने मुँडेर पर रखा हुआ है और खुद एक ठीये पर मोमो के लिए कीमा बना रहा है. तेज़ी से चॉपर चलाते हुए वह किसी ‘सेठ’ की माँ बहन एक कर रहा है.
ज़ोरों की भूख लगी है. हम ने चाय के साथ कुछ खाने को माँगा है .
“ “खाने के लिए तो भाई जी , मोमो बन रहा है. एक घण्टा लगेगा. बिस्कुट बगैरा कुछ नहीं है. तब तक सत्तू घोलना हो तो बोलो”.” छोकरा चण्ट है.
चौहान जी की ओर देखता हूँ .....अच्छा , चाय बनाओ और थोड़ा सत्तू और चीनी दो. मैं अपने पिट्ठू में से टटोल कर ताज़ा छङ की बोतल निकालता हूँ. पहले दो घूँट हलक़ से नीचे उतार कर फिर एक सूप बाऊल में सत्तू और चीनी के साथ इसे घोल कर खुद खाता हूँ और सहगल जी को भी खिलाता हूँ. इस रेसिपी को यहाँ बक्पिणि कहते हैं. हिमालय का फास्ट फूड ..... और एक कारगर एनेर्जाईज़र भी. इसे रोह्ताँग पर बीसियों बार आज़मा चुका हूँ. भूख भी मिट जाती है और प्यास भी. केलोरीज़ अलग मिलती है. ग्लुकोज़ से भी ज़्यादा असरदार. ऊपर से हल्का सा खुमार भी चढ़ा रहता है. चौहान जी ने फिर अजीब सा मुँह बनाया है. दारू ही मिल जाती , दो पेग सट लेते... बेचारे ! चाय पीते हुए वो सिगरेट के लम्बे लम्बे कश खींच रहे हैं. खाली मोग़्टू से निकलते भाप को हसरत से तकते हुए ! और मैं पेड़ों से छन कर आती धूप को महसूसने का प्रयास कर रहा हूँ. कामयाबी नहीं मिल रही. मैं ने गौर किया कि यहाँ टहनियों मे हरापन आ चुका है लेकिन कोंपलें अभी नहीं फूटीं हैं. इस अहसास ने मुझे गरमाहट दी है कि हम गरम इलाक़े में प्रवेश कर रहे हैं.

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काफी देर तक हरकत में नही होने के कारण जिस्म फिर से ठण्डा रहा है. उस्ताद बीर सिंह ने सलाह दी है कि आधे घण्टे मे हम कीर्तिंग़ पहुँच सकते हैं. वहाँ कुछ न कुछ खाने को मिल जाएगा . हमारे पास यह सलाह मानने के सिवा और विकल्प भी नहीं है. हम चलने ही लगे हैं कि इंजन की आवाज़ सुनाई दी है. हम लोग कतार मे खड़े होगए. गाड़ी आई और हमारे लाख हाथ जोड़ने के बावजूद गुर्राती हुई निकल गई है . हम पर ढेर कीचड़ उछालती और उबकाई पैदा करने वाला धुँए का काला गुबार छोड़ती हुई. चौहान जी की हालत पतली होने लगी है. उनका चेहरा देख कर लगता है अभी सरेंडर कर जाएंगे. धीरे धीरे हम आगे बढ़ने लगे हैं . मुझे डर था कि यह आदमी कहीं कोलेप्स न कर जाए. धूप तेज़ हो रही है और हवा का नामो निशान नहीं.
ख्रूटी नाला पार करते करते गला सूखने लग पड़ा है. एक जगह पॉपलर के बड़े से पेड़ के पास ज़मीन सीली हो रही है. देखा तो वहाँ पानी चू रहा है. . लेकिन इतना कम कि अंजुरी भर कर पिया भी न जाए. वहाँ कुछ घास के हरे तिनके उग रहे हैं और चिचिलोटि का एक नन्हा पीला फूल भी खिल रहा है. यह एक दुर्लभ फूल है. इस की उम्र बहुत कम होती है. बर्फ के बीच ही खिलता है और उस के पिघलने के साथ साथ झर भी जाता है. माँ कहा करतीं थीं कि यह फूल गाल पर रगड़ने से त्वचा नहीं झुलसती. मैने हाथ बढ़ा कर पीछे खींच लिए. इस उजाड़ में खिले अकेले फूल की हत्या करने चला था. एक बड़ा पाप करने से बच गया . बड़े स्नेह से मैंने उसे विदा कहा:
मेरे लौट कर आने तक यहीं रहना तुम
ओ नन्ही प्यारी चिचिलोटि
मैं रुकूँगा यहाँ तुम्हें खिलती हुई देखने को !

कीर्तिंग में कोई ढाबा खुला नहीं मिला. अलबत्ता एक बन्द दुकान के अहाते में कुछ युवक और अधेड़ छोलो और ताश खेल रहे हैं. हुक्के और चिलम चल रहे हैं . एकाध ने बीयर या व्हिस्की का जाम भी पकड़ रखा है हाथ में. नल पर खूब पानी पी कर हम आगे बढ़ गए हैं. मुझे कुछ भूख भी लगने लगी है. सहगल जी सहज और ‘कूल’ दिख रहे हैं. चौहान जी के चेहरे पर अथाह थकान और बेबसी नज़र आ रही है. अभी आधा रास्ता भी तय नही हुआ और दोपहर होने को आ रही है. थकावट, भूख, ढलता हुआ दिन और लिफ्ट न मिलने की खीज. ये सब मिल कर एक अवसाद पूर्ण अनुभूति उत्पन्न करते है. वाक़ई, यह एक सुखद यात्रा नहीं है. लेकिन मेरे भीतर एक कोना अभी भी पुलकित है , कि एक नई जगह को एक्स्प्लोर करूँगा .

षङ्गढ़ पार कर हम शाँशा गाँव के सिरे पर बने छोर्तेन के पास पहुँचे हैं. एक खेत पर हल जोता जा रहा है. “ ल्हासो .........हो $$$$$$$$ .... ” की पुकार सामने पहाड़ से टकरा कर देर देर तक गूँज रही है. “.ला ज़ङ्पोई पिवा ला नोर ज़ङ्पो लना..........हे ........यौहु योह बीर भाई कु, सुघर्निऊ टूँहषिकु, धरतिऊ मालकु........” इस गायन में अजीब सी कशिश है. हो भी क्यों न ? मानवीय श्रम और संघर्ष की अकथ गाथाओं का सार छिपा है इस में. मैं हाथ जोड़ कर नमन करता हूँ ……इस हलवाहे मानव को और उस के अनहद मर्मस्पर्शी गान को, और उन दो निरीह पशुओं को ! मेरी आँखे इस अद्भुत दृष्य से उपकृत हो कर भीग आईं हैं . ताज़ी मिट्टी की सुगन्ध हवा में तैर गई है. ब्यूँस ने हरियाली ओढ़ ली है. नवाँकुरित टहनियाँ हवा के उस झौंके में हौले से झूम गई हैं. उस पर बैठा कोई पक्षी आहिस्ता से चहक उठा है....... आह ! यह मधुरतम क्षण क्या मेरे लिए घटित हुआ? ईश्वर ,क्या यही हो तुम? अब इस सब के अलावा हो भी क्या सकते हो तुम ! मैं अपनी भूख प्यास और तमाम खुशी और गम भूल कर इस परिदृश्य में विलीन हो जाना चाहता हूँ.

तभी मोड़ के पीछे तेज़ हॉर्न की आवाज़ हुई है. दहाड़ता हुआ एक ट्रक आया है. मेरी तन्द्रा टूटी तो देखता हूँ चौहान जी दोनों हाथ जोड़ कर घुटनो के बल बीच सड़क पर बैठ गए हैं. जैसे कोई भगत देवता के आगे बैठता है. उन का ईश्वर तो अब जाकर आया है. सामने की सीटें फुल हैं. इशारे से हमें पीछे बैठने को कहा गया है. मैं और सह्गल जी तुरत फुरत चढ़ गए, चौहान जी एक्साईट्मेंट में गिरते पड़ते ट्रक के ‘डाले’ तक पहुँचे. मैंने हाथ दे कर उन्हें ऊपर खींच लिया है. शुक्र है, हम तीनों अन्दर हो गए. ट्रक में ताज़ा कटे लकड़ी के बेडौल ठेले भरे हुए हैं.. अभी हम बैठने के लिए जगह ढूँढ ही रहे हैं कि झटके से ट्रक चल पड़ा है. एक ठेला लुढ़कता हुआ चौहान जी की टाँगों से जा टकराया है. वो वहीं निढाल हो कर बैठ गए. उन की पॉलीकॉटन की पतलून घुटनो के पास रोमन ‘एल’ आकार में फट गई. मैंने पूछा – लगी तो नहीं ज़्यादा ?
‘लग्गी तो है , चल मराण देया... अपर पेंट फट गी माईयवी’. वह बन्दा बस रुलाई रोके हुए है किसी तरह.

जाहलमा पहुँच कर ठेले उतार दिए जाते हैं. हम ने भोजन के लिए दस मिनट रुकने का अनुरोध किया लेकिन ड्राईवर के पास ‘टेम’ नहीं है . अभी तक हम ने कुल 26 किलोमीटर का सफर तय किया है. इतना ही और चलना है. चलो अब गाड़ी में घण्टे भर की ही तो बात है. मैं ने खुद को तसल्ली दी है.

जूंडा गाँव पार करने पर जुनिपर के पेड़ दिखने लगते हैं. ये प्राकृतिक रूप से उगे हुए हैं. यहाँ से आगे हवा की तासीर ही बदल जाती है. गन्ध भी. यह शायद वेजिटेशन के कारण है. थिरोट के बाद तो दयार , कायल, राई तोस... तमाम अल्पाईन प्रजातियाँ मिल जाती हैं. यह इलाक़ा हरा भरा, गर्म, और संसाधनों से भरपूर है.शायद इसी लिए लोग भी केयर फ्री और मस्त हैं. मैं इस अद्भुत जगह को देख रोमेंटिक होना चाहता हूँ. लेकिन सडक बहुत खराब है .जम्प लगता है तो झटका पैरों से होता हुआ सीधे खोपड़ी पर लगता है. समझ में आता है कि लम्बी और खराब यात्राओं पर चलने वाले ट्रक ड्राईवर दिमाग पर ज़्यादा बोझ क्यों नहीं डालते. मैं भी सोचना छोड़ कर पड़ा रहता हूँ. ट्रक की गति और लय के साथ एकात्म होने की कोशिश करता !

उदयपुर पहुँचते हैं तो धूप जा चुकी है. माहौल एक दम सर्द सा है. बच्चे स्कूल से लौट रहे हैं. चौहान जी को हाथ का सहारा दे कर ट्रक से उतारता हूँ. उन की हथेलियाँ एक दम बरफ हो रहीं हैं. पैर भी ठीक से टिक नही रहे हैं. जब वो डाले के पीछे Horn * OK* Please लिखी जगह से घिसटते हुए उतर रहे थे तो उन के बायें पाँयचे पर एक गीला धब्बा नज़र आ रहा था. सह्गल जी मफलर में मुँह छिपाए खूब हँसे हैं. हो गया काम इस का तो. अरे नहीं सर, ठेले पर बरफ चिपका था. उस पर बैठने से भीग गया है.

मेरा मन है कि सब से पहले कुछ खा लिया जाय. लेकिन चौहान जी का विचार था कि पहले मन्दिर में माँ के दर्शन कर लिए जाएं. यहाँ प्रख्यात मृकुला मन्दिर है, जिस में लकड़ी की नक्काशी के अद्भुत नमूने हैं. महिषासुर मर्दिनी की बेशकीमती काँस्य प्रतिमा है. पुजारी जी ने इतिहास , पुराण , मिथक और दंतकथाओं की पंचमेल खिचड़ी हमे सुनाई. सब से पहले यहाँ केवल एक घर होता था पुजारियों का. यह परिवार काश्मीर से आ कर यहाँ बस गया था. माँ खुद बंगाल से आईं थीं. महिषासुर को यहीं मौत के घाट उतारा . आज पुजारियों के आठ परिवार बन गए हैं. उदय पुर गाँव में आज 70 के करीब घर हैं. सब इधर उधर से आ कर बसे हुए. ये संख्या बढ़ ही रही है. यहाँ उपमण्डल कार्यालय है. लेकिन बाज़ार में मात्र एक ही ढाबा है. मामू ढाबा. मामू को हम ने ताश की जुंडली से उठा कर लाया है. ताकि हमारे लिए भोजन बना सके. सुबह के भूखों ने खूब छक कर खाया है. इतना, कि रात को कुछ खाने की ज़रूरत ही न पड़े.

भोजन के बाद चाय पीते हुए सहगल जी ने गाईड का मशहूर गीत “मुसाफिर, जाएगा कहाँ” सुनाया है. सहगल जी बहुत अच्छा गाते हैं. जवानी में सब उन्हे कुन्दन लाल सह्गल पुकारते. इसी से यह तखल्लुस पड़ गया. वर्ना उन का असल नाम तो त्सेरिङ फुंत्सोग है ! “दम ले ले , घड़ी भर, यह छईंयाँ पाएगा कहाँ .. ओ मुसाफिर, ..... वहाँ कौन है तेरा ?” एक पुर सुकून संगीत ने मुझे उनींदा कर दिया है.

जब हम पुल पार कर पी डब्ल्यू डी रेस्ट हाऊस की तरफ सोने जा रहे थे तो सहगल जी ने मयाड़ घाटी का प्रवेश द्वार दिखाया. कल इसी नाले के अन्दर जाना है हमें. मैं उत्तेजित हूँ . चौहान जी आशंकित और सहगल साब उदासीन..... चौकी दार से एक हीटर माँग कर हम तापते रहे. वे लोग तो रज़ाई और हीटर की गरमाहट में जल्द ही बेसुध हो गए हैं. लेकिन मैं सोने से पहले दिन भर के अनुभव दर्ज कर लेना चाहता हूँ. बाहर असहज चुप्पी है. पिछवाड़े की झाड़ियों में एक लोमड़ी रात भर रोई है. मुझे कतई नींद् नहीं आ रही लेकिन अपने जूते - मोजे सुखा लिए हैं.
(जारी)

2 comments:

  1. सुंदर कहानी ... आगे की कहानी का इंतजार है .
    कभी समय मिले तो http://shiva12877.blogspot.com ब्लॉग पर भी अपने एक नज़र डालें .फोलोवर बनकर उत्सावर्धन करें .. धन्यवाद .

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  2. very good sir jeee pad kar yaad aaya ki aap mayad ja rahe they

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