Monday, June 6, 2011

मैत्रेय , अब तक तो तुम्हे आ जाना चाइए था !



हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि गीत चतुर्वेदी ने फेस बूक पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी छोड़ी है. यह धर्मों के इतिहास के धुन्ध को मिटाने मे काफी सहायक है. सवाल यह नही, कि ये स्थापनाएं कौन से इतिहास कार की हैं ? कि क्या यह काल निर्धारण अंतिम और प्रामाणिक हैं ? लेकिन इस इतिहास्दृष्टि ध्यान देना ज़रूरी है. यह दृष्टि मुझे आश्वस्त करती है. यहाँ दो मक़सदों से सेव कर रहा हूँ. एक तो फेस बूक मे इस के खो जाने का खतरा है. दूसरे , लगे हाथ यह ब्लॉग्गर मित्रों से भी शेयर कर लूँ .






मैत्रेय की अवधारणा, कल्कि और मुंतज़र, जिसका नाम मेहदी होगा, से कहीं पुरानी है. मैत्रेय की अवध...ारणा संभवत: दूसरी शताब्‍दी में विकसित हो जाती है. गांधार के क्षेत्र में जहां से अमिताभ सूत्र की उत्‍पत्ति मानी जाती है, वहां सौ साल तक शाक्‍यमुनि और मैत्रेय को एक ही माना जाने का भ्रम था. अगले कुछ ही बरसों में चीन में इसे और मान्‍यता मिल गई. कल्कि का पहला वर्णन विष्‍णु पुराण में ही मिलता है, जिसका रचनाकाल सातवीं शताब्‍दी माना जाता है. हालांकि हिंदू धर्मग्रंथों के रचनाकाल का सही निर्धारण हमेशा संदिग्‍ध रहा है, लेकिन फिर भी सारे स्रोत ऐसा संकेत करते हैं कि वह सातवीं-आठवीं शताब्‍दी यानी शंकर से ठीक पहले की बात है. मेहदी भी नवीं शताब्‍दी के हैं. सो, यह कहना कि मैत्रेय, कल्कि और मेहदी की तर्ज़ पर बने हैं, सही नहीं है. मैत्रेय को आप ईरानी देवता 'मित्र' से जोड़ सकते हैं, जो ज़ोरोअस्ट्रियनों का भविष्‍य-देव है. नाम-साम्‍य तो है ही, व्‍यवहार-साम्‍य भी है.

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